प्रश्न 1. रस किसे कहते हैं ?
उत्तर- रस का अर्थ एवं परिभाषा-
'रस्यते आस्वादयेत् इति रसः' अर्थात जिसका आस्वाद किया जाय, वही रस है। जिस प्रकार हमें स्वादिष्ट भोजन से स्वादेंद्रिय और मन को तृप्ति मिलती है, ठीक उसी प्रकार काव्य का आस्वादन करने से जो हृदय को आनंद मिलता है , वही रस कहलाता है। दूसरे शब्दों में किसी काव्य को पढने ,सुनने और देखने से जो आनद की अनुभूति होती है उसे रस कहते हैं । संक्षेप में - " साहित्यिक आनन्द का नाम ही रस है। '
प्रश्न 2.. रस की निष्पत्ति कैसे होती है ?
उत्तर- सहृदय के ह्रदय में स्थित स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग होता है, तब रस की निष्पत्ति होती है । आचार्य भारत मुनि ने कहा है - " विभावानुभाव व्यभिचारी संयोगात रस निष्पत्ति।"
प्रश्न 3. रस के कितने अंग हैं ?
उत्तर- रस के चार अंग होते हैं -
उत्तर- रस का अर्थ एवं परिभाषा-
'रस्यते आस्वादयेत् इति रसः' अर्थात जिसका आस्वाद किया जाय, वही रस है। जिस प्रकार हमें स्वादिष्ट भोजन से स्वादेंद्रिय और मन को तृप्ति मिलती है, ठीक उसी प्रकार काव्य का आस्वादन करने से जो हृदय को आनंद मिलता है , वही रस कहलाता है। दूसरे शब्दों में किसी काव्य को पढने ,सुनने और देखने से जो आनद की अनुभूति होती है उसे रस कहते हैं । संक्षेप में - " साहित्यिक आनन्द का नाम ही रस है। '
प्रश्न 2.. रस की निष्पत्ति कैसे होती है ?
उत्तर- सहृदय के ह्रदय में स्थित स्थायी भाव का जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग होता है, तब रस की निष्पत्ति होती है । आचार्य भारत मुनि ने कहा है - " विभावानुभाव व्यभिचारी संयोगात रस निष्पत्ति।"
प्रश्न 3. रस के कितने अंग हैं ?
उत्तर- रस के चार अंग होते हैं -
1. स्थायी भाव- यह भाव आश्रय के हृदय में स्थाई रूप से वर्तमान रहता है। इसकी संख्या 10 है।
2. विभाव- स्थाई भाव का जो कारण होता है,उसे ही विभाव कहते हैं। इसके दो भेद हैं- आलंबन और उद्दीपन
3. अनुभाव- आश्रय में रस उत्पन्न होने की दशा में जो शारीरिक,मानसिक,वाचिक चेष्टाओं में परिवर्तन होता है, अनुभाव कहलाता है । इसके चार प्रकार हैं- 1. कायिक 2. वाचिक 3. आहार्य 4. सात्विक
4. संचारी भाव- थोड़े समय के लिए उत्पन्न होने वाले भाव, संचारी भाव कहलाते है । इनकी संख्या 33 है ।